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Astrology

रत्न धारण करने से पूर्व सावधानी

रत्न उन मूल्यवान पत्थरों को कहा जाता है, जो अपनी अद्भुत आभा, चमक, कठोरता के कारण धारण किये जाते हैं। भिन्न-भिन्न राशियों के लिए भिन्न-भिन्न रत्न धारण किये जाने की सलाह दी जाती है। ये रत्न उन राशियों के लिये प्रभावी होते हैं। नौ ग्रहों को ध्यान में रखकर इन रत्नों को धारण किये जाने का परामर्श दिया जाता है। रत्न, संबंधित ग्रह की किरणों को अवशोषित कर, मानव पर प्रभाव डालता है। रत्नों से रोग निदान, मानसिक शान्ति तथा क्रुध्द ग्रहों (अनिष्ट कारक ग्रह) का प्रभाव समाप्त किया जाता है। प्रत्येक उद्देश्य हेतु अलग-अलग रत्न प्रभावी होते है। साधारणत: केवल लग्न या चन्द्रराशि के आधार पर ही रत्नों का चुनाव नहीं करना चाहिये, बल्कि अपनी समस्या के निराकरण का सर्वप्रथम ध्यान रखना चाहिये। यह आवश्यक नहीं है कि जो एक राशि के व्यक्ति को कोई रत्न उपयोगी है तो उसी राशि के सभी व्यक्तियों के लिये उपयोगी हो। क्योंकि एक ही राशि के अलग-अलग व्यक्तियों के लिये वही ग्रह अलग-अलग स्थानों में उपस्थित होता है। इस बात की सावधानी रत्न धारण करते समय अवश्य रखनी चाहिये। रत्नों में नौ रत्न अति विशिष्ट है- यथा माणिक, मोती, मूंगग, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद व लहसुनिया। मूॅगा, हीरा, माणिक, लहसुनिया, पन्ना दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली में, नीलम व गोमेद को मध्यमा अंगुली में, पुखराज को तर्जनी अंगुली तथा मोती कनिष्ठिका अंगुली में धारण करना चाहिये।

          पन्ना व मोती, हीरा एव माणिक्य, हीरा तथा लहसुनिया, माणिक्य व नीलम, एवं मूंग, ये रत्न आपस में शत्रुता रखते हैं, अत: इनको एक साथ नहीं धारण किया जाना चाहिये। माणिक्य, मोती, पुखराज सौम्य रत्न होते है इनको धारण करने में भी हानि की संभावना होती है। इसके विपरीत हीरा, लहसुनिया, गोमेद, नीलम, पन्ना, मूंगा की धारण करने में पूर्व उचित परामर्श अवश्य लेना चाहिये। रत्न का परामर्श देने से पूर्व विद्वान ज्योतिषी को व्यक्ति विशेष के ग्रहों का योग तथा आने वाले संकट तथा सभी ग्रहों की स्थिति, मैत्री एवं शत्रुता को देखकर विश्लेषण करना चाहिये। इसके उपरान्त ही उचित सलाह देनी चाहिये। नवरत्नों को एक साथ जड़ित अंगूठी धारण्ा करने से बचना चाहिये। रत्न धारण करने पर चमत्कारिक प्रभाव होते हैं- उचित रत्न धारण किया जाये, अन्यथा अनिष्ट की संभावना रहती है। यदि आप किसी ज्योतिषी से सलाह लेने जाये तो उसे अवश्य की बतायें कि पूर्व में आपने कौन-कौन से रत्न धारण कर चुके है और उसका क्या प्रभाव रहा। रत्न धारण से पूर्व ग्रहों की दृष्टि का पूरा ध्यान रखना चाहिये। राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती अत: गोमेद एवं लहसुनिया धारण करते समय अवश्य ही सावधारी रखनी चाहिये। रत्न को धारण करने से पूर्व उसकी शुध्दता, वनज तथा उनमें कोई ऐब न होने की तसल्ली कर लें। सम्भव हो तो रत्न को धारण करते समय दिन, शुभ मूहूर्त तथा समय का विशेष ध्यान रखें।

रत्नों के दोषों का विवरण

माणिक्य :- 

  इसका रंग सभी तरफ से एक समान होकर, इसमें आभा और चमक होनी चाहिये। धब्बेदार दरा, चिटका हुआ नहीं होना चाहिये।

मोती :-   
आभायुक्त गोल होना जरूरी है, इसमें धारियॉ नहीं होनी चाहिये। मोती बसरा का सर्वश्रेष्ठ रहता है।
मूंगा :-  
चटका हुआ, दो रंगों का, काली आभा वाला, चमक रहित, टेढ़ा-मेढ़ा धारण करने योग्य नहीं होता है। देशी मूंगा सर्वश्रेष्ठ होता है।
पुखराज :-   
आभाहीन, काले धब्बों से युक्त, दो रंगी, काली लकीर वाला बेढंगा, खुरदुरा दोष युक्त पुखराज पहनने के अयोग्य होता है।
 हीरा :-   
काले, लाल, या सफेद धब्बे वाला, चमक रहित, धूम्र रंगी दरारों वाली पीली दुति वाला, गंदा मटमौला, तथा लाल आभा वाला हीरा पहनने के योग्य नहीं होता।
नीलम :-   
चमक रहित लाल या दूधिया रंगों वाला, दो रंगों वाला, जिसमें श्वेत रेखायें व धब्बे हो, ऐसा नीलम बिल्कुल नहीं धारण करना चाहिये।
पन्ना :-   
आभाहीन, धब्बों से युक्त दो रंगों का चटका हुआ, काली रेखा एवं धब्बों ये युक्त पन्ना नहीं धारण करना चाहिये।
गोमेद :-  
सफेद, लाल, काले रंग के धब्बों वाला, चितकबरा, दो रंगा, पहनने के काबिल नहीं होता। गोमूत्र के रंग का गोमेद श्रेष्ठ होता है।
लहसुनिया :-  
बिल्ली की आंखों की दुति वाला चमकदार लहसुनिया ही पहनना चाहिये। यह खुरदरेपन, टेढ़ी-मेढ़ी धारियों वाला, आभाहीन लाल तथा सफेद धब्बों वाला, क्रास जैसी आकृति वाला लहसुनिया भी पहनने के योग्य नहीं होता है।
 

यही सिध्दान्त उपरत्नों के साथ भी लागू होता है। 

सुनील के0 सिंह

स्वतन्त्र भारत

9 अक्टूबर, 2006